Tuesday, 8 July 2014

मौन ही मेरी चीख है !














दर्द से जी चीख उठा
वह लम्हा जब याद आया।

तेरे शब्दों से बिखरी थी जब
कोई और किनारा न मिला तब।

उसी वक़्त आँखें मूंदी
सब्र की दीवार फिर से टूटी।

एक हाथ बढ़ा आश्रय देने
बुने रिश्तों के ताने बाने।

दिल ने ढूंढा फिर से सहारा
आँखें खोल देखा हाथ था तेरा।

असमंजस हुआ यह कैसा रिश्ता है!
जो दुःख दे वही  सहारा है!

स्वीकार किया यही है भाग्य मेरा
सुख भी तेरा दुःख भी तेरा।

 

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